शनिवार, 25 नवंबर 2017

पद्मश्री गोपाल दास 'नीरज'- चलो फिर गाँव का आँगन तलाशें


तेरा बाज़ार तो महँगा बहुत है
लहू फिर क्यों यहाँ सस्ता बहुत है।

सफ़र इससे नहीं तय हो सकेगा
यह रथ परदेश में रुकता बहुत है।

न पीछे से कभी वो वार करता
वो दुश्मन है मगर अच्छा बहुत है।

नहीं क़ाबिल गज़ल के है ये महफ़िल
यहाँ पर सिर्फ़ इक-मतला बहुत है।

चलो फिर गाँव का आँगन तलाशें
नगर तहज़ीब का गन्दा बहुत है।

क़लम को फेंक, माला हाथ में ले
धरम के नाम पर धन्धा बहुत है।

अकेला भी है और मज़बूर भी है
वो हर इक शख़्स जो सच्चा बहुत है।

सुलगते अश्क़ और कुछ ख़्वाब टूटे
ख़ज़ाना इन दिनों इतना बहुत है।

यहाँ तो और भी हैं गीत गायक
मगर नीरज की क्यों चर्चा बहुत है।

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

"रोशनी हो, न हो, जला कीजे"- राजू रंगीला


वो आदमी है तो हुआ कीजे
वो आदमी रहे दुआ कीजे।

सिर्फ होने से कुछ नहीं होता
आपने होने का हक़ अदा कीजे।

कुछ तो भीतर की घुटन कम होगी
खिड़कियों की तरह खुला कीजे।

घर ही दीवारों से बने माना
घर में दीवार हो तो क्या कीजे।

हंसते-हंसते ही आंख भर आये
इतना खुलके भी न हंसा कीजे।

हमने ये जुगनुओं से सीख लिया
रोशनी हो, न हो, जला कीजे।

सारे मसलों पे फिर से सोचेंगे
पहले माहौल ख़ुशनुमा कीजे।
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बुधवार, 2 अगस्त 2017

देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र': ख़ुद आग लगाता है



ख़ुद आग लगाता है जो घर अपना बसाकर
क्या पाओगे उस शख़्स की हस्ती को मिटाकर।

जिस शख़्स पे तुम फेंक रहे आज हो पत्थर
कल उस पे गये लोग हैं कुछ फूल चढ़ाकर।

वो मोम की बुलबुल को कहां लेके चला है
यूं आग के दरिया में सफ़ीने को बहाकर।

वो राख से पोशिदा है इक शोला-ए-ग़ैरत
मत रक्खो उसे पांव के नीचे यूं दबाकर।

दर और दरीचों के लिए सोच रहा है
वो कांच की बुनियाद पे दीवार उठाकर।

ज़िक्र उसकी बुलन्दी का किया बज़्म में सबने
चलता था सरेराह जो सर अपना झुकाकर।

आप उसकी रिहाई की दुआ मांग रहे हैं
फंदे को रहा चूम कि जो दार पे जा कर।
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दार- फांसी
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शनिवार, 22 जुलाई 2017

शिवओम अम्बर: ज़मीं और आसमां




इक तरफ बाग़ी मशालें इक तरफ शाहेज़हां
देखना है यह कहानी ख़त्म होती है कहां।

पत्थरों का ख़ौफ होगा शीशमहलों के लिए
काटकर चट्टान को हमने बनाया है मकां।

बिजलियों पर टिप्पणी भी दूं मुझे यह हक़ नहीं
गो चमन में एक मेरा ही जला है आशियां।

किस बहर में इस नगर की धड़कनें बांधू इधर
हर नज़र में हैं शरारे हर ज़िगर में है धुआं।

पंख जलकर ही रहे संपातियों के स्वप्न के
है ज़मीं आखिर ज़मीं, है आसमां फिर आसमां।

इस गली कैफ़ियत मत पूछिये नाचीज़ की
बेज़ुबानों में कहीं से आ बस है बदज़ुबां। 
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Courtesy: Painting: Christ Of Freedom: https://in.pinterest.com/pin/387942955374416214/