बुधवार, 2 अगस्त 2017

देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र': ख़ुद आग लगाता है



ख़ुद आग लगाता है जो घर अपना बसाकर
क्या पाओगे उस शख़्स की हस्ती को मिटाकर।

जिस शख़्स पे तुम फेंक रहे आज हो पत्थर
कल उस पे गये लोग हैं कुछ फूल चढ़ाकर।

वो मोम की बुलबुल को कहां लेके चला है
यूं आग के दरिया में सफ़ीने को बहाकर।

वो राख से पोशिदा है इक शोला-ए-ग़ैरत
मत रक्खो उसे पांव के नीचे यूं दबाकर।

दर और दरीचों के लिए सोच रहा है
वो कांच की बुनियाद पे दीवार उठाकर।

ज़िक्र उसकी बुलन्दी का किया बज़्म में सबने
चलता था सरेराह जो सर अपना झुकाकर।

आप उसकी रिहाई की दुआ मांग रहे हैं
फंदे को रहा चूम कि जो दार पे जा कर।
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दार- फांसी
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शनिवार, 22 जुलाई 2017

शिवओम अम्बर: ज़मीं और आसमां




इक तरफ बाग़ी मशालें इक तरफ शाहेज़हां
देखना है यह कहानी ख़त्म होती है कहां।

पत्थरों का ख़ौफ होगा शीशमहलों के लिए
काटकर चट्टान को हमने बनाया है मकां।

बिजलियों पर टिप्पणी भी दूं मुझे यह हक़ नहीं
गो चमन में एक मेरा ही जला है आशियां।

किस बहर में इस नगर की धड़कनें बांधू इधर
हर नज़र में हैं शरारे हर ज़िगर में है धुआं।

पंख जलकर ही रहे संपातियों के स्वप्न के
है ज़मीं आखिर ज़मीं, है आसमां फिर आसमां।

इस गली कैफ़ियत मत पूछिये नाचीज़ की
बेज़ुबानों में कहीं से आ बस है बदज़ुबां। 
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Courtesy: Painting: Christ Of Freedom: https://in.pinterest.com/pin/387942955374416214/

बुधवार, 12 जुलाई 2017

पद्मश्री गोपाल दास 'नीरज': ऐसे माहौल में



अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाय
जिसमें इन्सान को इन्सान बनाया जाये।

जिसकी ख़ुशबू से महक़ जाये पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हरसिम्त खिलाया जाये।

आग बहती है यहाँ गँगा में झेलम में भी
कोई बतलाये कहाँ जा के नहाया जाये।

 प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अन्धेरे को उजाले में बुलाया जाये।

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाये।

ज़िस्म दो हो के भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाये।

गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रुबाई है दुखी
ऐसे माहौल में 'नीरज' को बुलाया जाये।
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रविवार, 9 जुलाई 2017

हम तो वही हैं: पद्मश्री गोपाल दास 'नीरज'



करने चले थे होम मगर हाथ जल गये
हम यूं हंसे कि आंख से आंसू निकल गये।


दिखते हैं सबसे पीछे यहां आज वो ही लोग
मरने के दिन जो मौत से आगे निकल गये।

वो दिन जो ज़िन्दगी के गुजारे तेरे बग़ैर
कुछ अश्क बन गये तो कुछ गीतों में ढल गये।

दैरो-हरम की राह में जो लड़खड़ाये पांव
आये वो मयक़दे में तो ख़ुद ही संभल गये।

है इश्क़ जिसका नाम वो कि ऐसी आग है
जो भी बुझाने आये इसे वो ख़ुद ही जल गये।

आयेगी कल बहार इसी एक आस में
टूटे हुए घिरौंदों से भी हम बहल गये।

इस कारवाने-क़ौम की इतनी है दास्तां
रस्ते वही हैं सिर्फ़ मुसाफिर बदल गये।

नीरज का हाल कोई जो पूछे तो बताइयो
हम तो वही हैं आज भी पर वो बदल गये।
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